Tuesday, October 7, 2008
अपने दोस्तों के लिए अम्बर बहरैची की गजल
सात रंगों की धनक यों भी सजा कर देखना
मेरी परछाई ख़यालों में बसा कर देखना
आसमानों में ज़मीं के चाँद तारे फेंक कर
मौसमों को अपनी मुट्ठी में छिपा कर देखना
फ़ासलों की कैद से धुंधला इशारा ही सही
बादलों की ओट से आँसू गिरा कर देखना
लौट कर वहशी जज़ीरों से मैं आऊँगा जरुर
मेरी राहों में बबूलों को उगा कर देखना
जंगली बेलें लिपट जाएँगी सारे जिस्म से
एक शब, रेशम के बिस्तर पर गँवा कर देखना
मेरे होने या न होने का असर कुछ भी नहीं
मौसमी तब्दीलियों को आज़मा कर देखना
दूध के सोंधे कटोरे, बाजरे की रोटियाँ
सब्ज यादों के झुके चेहरे उठा कर देखना
ख़ाकज़ादे आज किस मंज़िल पे 'अंबर' आ गए
शहर में बिखरे हुए पत्थर उठा कर देखना
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