छोटे शहरों की अपनी वेदना होती है, वो अपने बाशिदों को शायद वो नहीं दे पता है जो की वे अपेक्षा रखते हैं या कभी कभी वो भी जिसके लायक वो हैं। पिपरिया भी उसी हाल का शहर ही रहा। न जाने कितने प्रतिभाओं ने सिर्फ इसी लिए दम तोडा होगा की उन्हें कोई अच्छा अवसर ही नहीं मिला। मिला भी तो अपने ही समझ न सके।
इन्ही में से एक है पिपरिया में ही जन्मे और कालीकट विश्वविध्यालय से पीएचडी करने वाले पर्यावरण विज्ञानी डा राजेंद्र सोनी। अछे खासे जामे कालीकट थे में पर्यावरण के क्षेत्र में झंडे गाड़ रहे थे, पर अचानक जन्मभूमि की याद आने लगी और बाँध लिया बोरिया बिस्तर।
पिपरिया आये तो जज्बा था की अपने शहर में अपने लोगों के लिए बहुत कुछ करूँगा। शुरू शुरू में अत्यधिक सक्रिय रहे पर जो अनुभव हुए उससे थक हार कर घर जा बैठे, अनुभव नहीं गिनाऊंगा क्योंकि इसमें कई लोगों के नाम खलनायक की तरह आयेंगे।
इस तरह ख़त्म हुआ के अच्छा चित्रकार, अच्छा पर्यावरण विज्ञानी, अच्छा समाज सेवक, अच्छा लेखक और कवि, सबसे ऊपर अच्छा इंसान। इन सब में से सिर्फ अछे इंसान ही बचा है जो की अपने पुस्तैनी सोने चाँदी की दूकान पर बैठकर व्यापारी होने का प्रयास/स्वांग कर रहा है. लेकिन अब माहौल बदल गया है संसाधनों की कमी से जूझता पिपरिया संसाधन विहीन नहीं रहा है. सो प्रयास जारी है दूसरी पारी खेलने के.
शुभकामनाएं राजू भैया
Thursday, April 30, 2009
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