Monday, June 4, 2018

देखिए आसमान में भी सुराख होता है...पिपरिया शहर के युवाओं का एक सार्थक प्रयास


(संजीव परसाई) पिपरिया के युवा स्वयं सेवी संगठन जय माता दी समिति, सांडिया रोड को उनके पर्यावरण सुधार के प्रयासों के लिए प्रदेश स्तर पर सम्मानित किया गया है. उन्हें यह सम्मान विशेषकर नर्मदा नदी में ऊगने वाली जल कुम्भी या एजोला को निर्मूल करने के लिए दिया गया है. भोपाल में आयोजित एक गरिमामय कार्यक्रम में समिति को प्रदेश के मुख्यमंत्री महोदय द्वारा सम्मानित किया जाएगा. इस आलेख में समिति के प्रयास की एक झलक प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है.


दम तोडती नदियों की संख्या लगातार बढ़ाती जा रही हैं. शासन, प्रशासन और संगठन इन नदियों के पुनरुद्धार के लिए कमर कसे हुए हैं, लेकिन ये सर्वविदित है कि बिना नागरिकों की सक्रीय भागीदारी के इन नदियों का जीवन बचाना एक कठिन चुनौती है. मध्यप्रदेश वासी जीवनदायनी नर्मदा के लिए अधिक चिंतित हैं. नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक से अरब सागर तक तट पर बसे शहरों, और कस्बों की जिम्मेदारी अत्यधिक बड़ी है. श्रद्धालुओं का जन सैलाब नर्मदा नदी को पूजने के साथ प्रदुषण का भी प्रमुख कारण होता है. मानव जनित प्रदुषण के साथ नर्मदा नदी में जलकुम्भी या एजोला की समस्या निरंतर बढती जा रही है. गत वर्ष साल 2017 में पिपरिया से सटे नर्मदा तट सांडिया पर इस भयावह प्रकोप को देखा गया. हालात यह हो चले थे कि श्रद्धालुओं को अपनी माँ नर्मदे की चिंता सताने लगी. इस समस्या के चलते जहाँ एक ओर घाट नर्मदा तट से दूर होते चले गए, जिससे श्रद्धालुओं को नर्मदा स्नान एक दुष्कर काम लगने लगा वहीँ दूसरी ओर नर्मदा के प्रवाह से जीवन यापन करने वाले लाखों लोगों की आजीविका भी प्रभावित होने लगी.
इस चुनौती की आहट पिपरिया के एक युवा संगठन “जय माता दी समिति” तक भी पहुंची. समिति के प्रमुख संगठक श्री संदीप शर्मा, ने इस चुनौती की अपने साथियों से चर्चा की, और देखते ही देखते 50 युवाओं का हुजूम इस मुश्किल चुनौती से जूझने के लिए नर्मदा नदी में कूद पड़ा. गौरतलब है कि न तो तब इन युवाओं के पास इस कार्य को करने का कोई तकनीकी अनुभव था न ही कोई संसाधन ही मौजूद थे. इन युवाओं के पास बस अपनी नागरिक चेतना और दृढ़ इच्छा शक्ति ही पहला और अंतिम साधन थी.
जैसा की हर काम में सामाजिक चुनौतियां आती हैं, और शुरुआत में जन सहयोग सीमित रहता है, वो इनके साथ भी हुआ. संदीप शर्मा कहते हैं “ जब हम इस काम को करने का बीड़ा उठा चुके थे, तब स्थानीय लोगों ने हमसे कहा कि ये एक कठिन काम है, जिसके लिए एक बड़ी योजना बनानी पड़ेगी.” बात सही थी की हमें योजना बनाना था, लेकिन योजना बनाने और उसके क्रियान्वयन में लगने वाला समय हमारे पास नहीं था. से हमने इसे बिना किसी पूर्व तैयारी के ही करने का निर्णय लेना पड़ा.
जय माता दी समिति के योद्धाओं ने अपने निजी संसाधनों से गैंती, फावड़े, टोकरे, रस्सियाँ आदि सामगी इकठ्ठा की और जुट गए, माँ नर्मदा को बचाने में. कुछ दिनों बाद इस काम की आहात स्थानीय मीडिया को मिली और उनके सहारे स्थानीय जन प्रतिनिधियों और प्रशासन को, लेकिन तब तक शुरूआती मुसीबतें झेल कर इन युवाओं का हौंसला चट्टान की तरह मजबूत हो गया था. साथी मनोज राठी कहते हैं – जब काम शुरू हुआ तो शुरूआती चुनौतियों और संसाधनों की कमी के चलते कई बार हमारा हौसला टूटते टूटते बचा. बस हम सभी एक दुसरे को हिम्मत बंधाते हुए काम में लगातार लगे रहे.
जय माता दी समिति ने इस दौरान इन्टरनेट पर ब्लॉक लगाकर एजोला को निकालने की तकनीक की जानकारी प्राप्त की. और 21 मार्च से 15 अप्रैल तक एक सघन अभियान चलाया और पिछले क्षेत्रों से बहकर आने वाले एजोला को सांडिया में ही रोक दिया. इसका प्रभाव होशंगाबाद तक हुआ और सांडिया से होशंगाबाद तक नर्मदा एजोला से मुक्त हो गयी. इस काम में प्रशासन और घाट निर्माण समिति सांडिया, ग्राम पंचायत सांडिया, श्री साईं सेवा समिति आदि के साथ स्वयं सेवी संगठनों, और आम नागरिकों ने भरपूर सहयोग किया.

Thursday, April 30, 2009

कुछ ख़त्म हो गए दाल-रोटी के चक्कर में ही...

छोटे शहरों की अपनी वेदना होती है, वो अपने बाशिदों को शायद वो नहीं दे पता है जो की वे अपेक्षा रखते हैं या कभी कभी वो भी जिसके लायक वो हैं। पिपरिया भी उसी हाल का शहर ही रहा। न जाने कितने प्रतिभाओं ने सिर्फ इसी लिए दम तोडा होगा की उन्हें कोई अच्छा अवसर ही नहीं मिला। मिला भी तो अपने ही समझ न सके।
इन्ही में से एक है पिपरिया में ही जन्मे और कालीकट विश्वविध्यालय से पीएचडी करने वाले पर्यावरण विज्ञानी डा राजेंद्र सोनी। अछे खासे जामे कालीकट थे में पर्यावरण के क्षेत्र में झंडे गाड़ रहे थे, पर अचानक जन्मभूमि की याद आने लगी और बाँध लिया बोरिया बिस्तर।
पिपरिया आये तो जज्बा था की अपने शहर में अपने लोगों के लिए बहुत कुछ करूँगा। शुरू शुरू में अत्यधिक सक्रिय रहे पर जो अनुभव हुए उससे थक हार कर घर जा बैठे, अनुभव नहीं गिनाऊंगा क्योंकि इसमें कई लोगों के नाम खलनायक की तरह आयेंगे।
इस तरह ख़त्म हुआ के अच्छा चित्रकार, अच्छा पर्यावरण विज्ञानी, अच्छा समाज सेवक, अच्छा लेखक और कवि, सबसे ऊपर अच्छा इंसान। इन सब में से सिर्फ अछे इंसान ही बचा है जो की अपने पुस्तैनी सोने चाँदी की दूकान पर बैठकर व्यापारी होने का प्रयास/स्वांग कर रहा है. लेकिन अब माहौल बदल गया है संसाधनों की कमी से जूझता पिपरिया संसाधन विहीन नहीं रहा है. सो प्रयास जारी है दूसरी पारी खेलने के.
शुभकामनाएं राजू भैया

Tuesday, October 7, 2008

अपने दोस्तों के लिए अम्बर बहरैची की गजल



सात रंगों की धनक यों भी सजा कर देखना
मेरी परछाई ख़यालों में बसा कर देखना

आसमानों में ज़मीं के चाँद तारे फेंक कर
मौसमों को अपनी मुट्ठी में छिपा कर देखना

फ़ासलों की कैद से धुंधला इशारा ही सही
बादलों की ओट से आँसू गिरा कर देखना

लौट कर वहशी जज़ीरों से मैं आऊँगा जरुर
मेरी राहों में बबूलों को उगा कर देखना

जंगली बेलें लिपट जाएँगी सारे जिस्म से
एक शब, रेशम के बिस्तर पर गँवा कर देखना

मेरे होने या न होने का असर कुछ भी नहीं
मौसमी तब्दीलियों को आज़मा कर देखना

दूध के सोंधे कटोरे, बाजरे की रोटियाँ
सब्ज यादों के झुके चेहरे उठा कर देखना

ख़ाकज़ादे आज किस मंज़िल पे 'अंबर' आ गए
शहर में बिखरे हुए पत्थर उठा कर देखना

Wednesday, September 24, 2008

पिपरिया के बारे में दो शब्द

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 150 किलो मीटर दूर है पिपरिया। सामान्य तौर पर पिपरिया को सिर्फ़ पचमढ़ी जाने के लिए रास्ते में पड़ने वाले एक नजदीकी शहर के रूप में जाना जाता है। पर पिपरिया शहर की अपनी भी एक पहचान है. यह पहचान बनी है पिपरिया के लोगों से जिन्होंने अपने अपने क्षेत्र में रहकर पिपरिया का नाम रोशन किया. कई नाम है जिन्होंने राजनीती, समाजसेवा, साहित्य, शासकीय सेवा और एक व्यक्ति के तौर पर ख्याति अर्जित की.
पिपरिया असल में आसपास के हजारों एकड़ के क्षेत्रफ़ल में बसे उपजाऊ भूमि वाले खेतों के बीच इकलौता शहर है जो की आसपास के सम्रद्ध ग्रामीणों के संसाधनों की पूर्ति सुनिश्चित करता है, फलतः पिपरिया में व्यापार अत्यन्त सम्रद्ध है। यहाँ प्रदेश की बड़ी मंडियों में शुमार अनाज मंदी है जो की न सिर्फ़ पूरे भारत में अपितु विदेशों में अनाज भेजती है. कृषि उत्पादों में अब्बल नंबर होने की वजह से ही पिपरिया की तुअर दाल पूरे संसार में मशहूर है.
जहाँ पिपरिया कृषि व व्यापार में अपना योगदान देकर देश के विकास में अपना योगदान दे रहा है वही दूसरी और पिपरिया को एक साहित्यिक, सांस्कृतिक व भारतीय संस्कृति की पोषक धरती के रूप में भी जाना जाता है, पिपरिया में मनाये जाने वाला दशहरा आज भी जिस जोशो खरोश से मनाया जाता है उसे देखकर मुंबई दिल्ली वाले भी शर्मा जाएँ।
आज पिपरिया भारत के अन्य शहरों की तरह ही प्रगति के सोपान चढ़ रहा है, आज यहाँ का युवा पूरी दुनिया में काम कर रहा है और अपने होने का अहसास करा रहा है।सबसे बड़ी बात यह है की वो आज भी पिपरिया से जुदा नही हुआ है. आज पिपरिया में सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थाएं है जिनमें पिपरिया ही नही आसपास के ग्रामीण अंचलों के प्रतिभाशाली बच्चे अपनी शिक्षा पूरी कर रहे हैं, वही स्वास्थय सेवाओ में भी पिपरिया श्रेष्ठ है. इस सबसे ऊपर पिपरिया जिंदादिल लोगों की बस्ती है जो की बुरे हाल में भी ठहाका मारना जानते हैं. ऐसा ठहाका की हालत भी शरमा जाएँ,
काय सही कही कि नईं......
पिपरिया के सार समाचार, गीत कवितायें, और भी बहुत कुछ जल्द ही......