Wednesday, September 24, 2008

पिपरिया के बारे में दो शब्द

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 150 किलो मीटर दूर है पिपरिया। सामान्य तौर पर पिपरिया को सिर्फ़ पचमढ़ी जाने के लिए रास्ते में पड़ने वाले एक नजदीकी शहर के रूप में जाना जाता है। पर पिपरिया शहर की अपनी भी एक पहचान है. यह पहचान बनी है पिपरिया के लोगों से जिन्होंने अपने अपने क्षेत्र में रहकर पिपरिया का नाम रोशन किया. कई नाम है जिन्होंने राजनीती, समाजसेवा, साहित्य, शासकीय सेवा और एक व्यक्ति के तौर पर ख्याति अर्जित की.
पिपरिया असल में आसपास के हजारों एकड़ के क्षेत्रफ़ल में बसे उपजाऊ भूमि वाले खेतों के बीच इकलौता शहर है जो की आसपास के सम्रद्ध ग्रामीणों के संसाधनों की पूर्ति सुनिश्चित करता है, फलतः पिपरिया में व्यापार अत्यन्त सम्रद्ध है। यहाँ प्रदेश की बड़ी मंडियों में शुमार अनाज मंदी है जो की न सिर्फ़ पूरे भारत में अपितु विदेशों में अनाज भेजती है. कृषि उत्पादों में अब्बल नंबर होने की वजह से ही पिपरिया की तुअर दाल पूरे संसार में मशहूर है.
जहाँ पिपरिया कृषि व व्यापार में अपना योगदान देकर देश के विकास में अपना योगदान दे रहा है वही दूसरी और पिपरिया को एक साहित्यिक, सांस्कृतिक व भारतीय संस्कृति की पोषक धरती के रूप में भी जाना जाता है, पिपरिया में मनाये जाने वाला दशहरा आज भी जिस जोशो खरोश से मनाया जाता है उसे देखकर मुंबई दिल्ली वाले भी शर्मा जाएँ।
आज पिपरिया भारत के अन्य शहरों की तरह ही प्रगति के सोपान चढ़ रहा है, आज यहाँ का युवा पूरी दुनिया में काम कर रहा है और अपने होने का अहसास करा रहा है।सबसे बड़ी बात यह है की वो आज भी पिपरिया से जुदा नही हुआ है. आज पिपरिया में सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थाएं है जिनमें पिपरिया ही नही आसपास के ग्रामीण अंचलों के प्रतिभाशाली बच्चे अपनी शिक्षा पूरी कर रहे हैं, वही स्वास्थय सेवाओ में भी पिपरिया श्रेष्ठ है. इस सबसे ऊपर पिपरिया जिंदादिल लोगों की बस्ती है जो की बुरे हाल में भी ठहाका मारना जानते हैं. ऐसा ठहाका की हालत भी शरमा जाएँ,
काय सही कही कि नईं......
पिपरिया के सार समाचार, गीत कवितायें, और भी बहुत कुछ जल्द ही......

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